Sunday, November 24, 2013

रंजीश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ, आ फिर से मुझे छोड के जाने के लिये आ... - अहमद फ़राज

रंजीश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ,
आ फिर से मुझे छोड के जाने के लिये आ....

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो,
रस्मो - ए - राहे दुनिया ही निभाने के लिये आ...

किस किस को बतायेंगे जुदाई का सबब हम,
तु मुझसे खफा है तो झमाने के लिये आ...

कुछ तो मेरे पिंडार-ए-मुहब्बत का भरम रख,
तु भी तो कभी मुझको मनाने के लिये आ...

एक उम्र से हुं लझ्झत-ए-गिरिया से भी महरूम,
अय राहत-ए-जाँ मुझको रुलाने के लिये आ...

- अहमद फ़राज

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